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जुनूनी इश्क द सगा बिगिंस

दिल्ली 

मल्होत्रा मेंशन

शहर के सबसे प्रतिष्ठित और हाई-प्रोफाइल इलाके में स्थित मल्होत्रा मेंशन अपने आप में एक अलग ही दुनिया था। ऊँची दीवारें और चारों तरफ कड़ी सिक्योरिटी इस बात का सबूत थीं कि यहाँ रहने वाले लोग आम नहीं हैं!

बड़ा सा काले लोहे का गेट, जिस पर सादगी से उकेरा गया Malhotra सरनेम—

ना ज़्यादा दिखावा, ना फ़ालतू शोर… बस खामोश रुतबा।

अंदर दाख़िल होते ही चौड़ा लॉन, करीने से सजे पेड़-पौधे और पत्थरों से बना रास्ता सीधे मेंशन के मुख्य दरवाज़े तक ले जाता है। इमारत का आर्किटेक्चर मॉडर्न और रॉयल का परफेक्ट मेल था—ऊँची छतें, बड़ी खिड़कियाँ और सॉफ्ट लाइट्स।

मेंशन के अंदर हर चीज़ क्लास और कंट्रोल की पहचान थी।

सफेद-सुनहरे रंगों में सजा ड्रॉइंग रूम, दीवारों पर फैमिली पोर्ट्रेट्स और चारों तरफ पसरी एक ठहरी हुई खामोशी।

मेंशन के अंदर , विशाल हॉल में एक आदमी सोफे पर बैठा हुआ था। उसके हाथ में एक फाइल थी और सामने एक लड़की खड़ी थी। देखने में वह बेहद खूबसूरत थी। उसने ब्लैक जींस और व्हाइट टॉप पहन रखा था, जिसमें उसकी खूबसूरती और भी निखर कर सामने आ रही थी।

उस लड़की का नाम था — रिमझिम मल्होत्रा।

सामने बैठे आदमी की उम्र लगभग पचास वर्ष के आसपास रही होगी। वह रिमझिम को गौर से देखते हुए बोले—

“झुनु, तुम अब बीस साल की हो गई हो, लेकिन अभी तक तुमने अपने गुस्से पर काबू करना नहीं सीखा। यह तुम्हारा तीसरा कॉलेज है, जहाँ से तुम्हें रेस्टीकेट किया गया है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो तुम ग्रेजुएट कैसे बनोगी, बताओ?”

उनके चेहरे पर गुस्सा और निराशा—दोनों साफ झलक रहे थे।

रिमझिम तुरंत बोली "" आप कर पाते हो डैड ?"

रिमझिम के डैड तुरंत बोले "" क्या?"

रिमझिम मुस्कुराते हुए कहा "" गुस्सा कण्ट्रोल डैड ""! 

डैड गुस्से में बोले "" चुप करो झुनु "!!

रिमझिम तुरंत बोली "" देखो डैड आपको गया गुस्सा आप क्यों भूल जाते हो की मैं आपका ही फीमेल वर्शन हु आप गुस्सा कण्ट्रोल करो मैं भी कोशिश करुँगी लेकिन कन्फर्म नहीं बता सकती !!""

रिमझिम के डैड उसे गुस्से से घूरते है !! जिसे देख रिमझिम चुप हो जाती है !! वहा पर थोड़ी देर के लिए शान्ति हो गई !!

लेकिन फिर रिमझिम ने उनकी ओर देखा और बोली—

“डैड, आई नो… मैं अपने गुस्से पर कंट्रोल नहीं कर पाती, लेकिन मैं क्या करूँ?” आप कर 

रिमझिम के पिता, मिस्टर रचित मल्होत्रा, सख्त लहजे में बोले—

“अब जब तक तुम्हारा ग्रेजुएशन पूरा नहीं हो जाता, मैं तुम्हें एक लिमिट में ही पैसे दूँगा। हर महीने सिर्फ तीस हज़ार। इसी में तुम्हें अपना सारा खर्च निकालना होगा। और अब तुम अपनी नानी के घर मुंबई जा रही हो। वहीं रहकर ग्रेजुएशन करोगी — बिना मेरे नाम का इस्तेमाल किए।”

रिमझिम चिल्लाकर बोली—

“व्हाट? आर यू सीरियस, डैड? मैं कहीं नहीं जाऊँगी!”

रचित जी हल्की मुस्कान के साथ बोले—

“अगर तुम मुंबई नहीं गईं, तो मैं तुम्हें एक रुपया भी नहीं दूँगा। रिमझिम, तुम बहुत ज़िद्दी हो गई हो।”

उनकी बात सुनकर रिमझिम परेशान और हैरान हो गई। वह बोली—

“डैड, मैं आपकी ही औलाद हूँ ना? कहीं से उठा कर तो नहीं लाए हो मुझे?”

रचित जी गुस्से में बोले—

“बकवास बंद करो! तुम आज ही मुंबई जा रही हो। फैसला फाइनल है। आज रात की फ्लाइट है, तैयार रहना… झुनु!”

गुस्से में रिमझिम पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई। वहीं रचित जी ने गहरी साँस ली।

दो दिन बाद

मुंबई

मित्तल हाउस

नीले रंग का अनारकली पहने एक लड़की आईने के सामने खड़ी खुद को देख रही थी। वह खुद से ही बोली—

“रिमझिम, अगर मुंबई से वापस दिल्ली अपने घर जाना है, तो यहाँ अपने गुस्से पर कंट्रोल करना होगा। नहीं तो डैड बिना ग्रेजुएशन पूरा हुए मुझे दिल्ली बुलाने से रहे।”

अभी वह खुद से बातें कर ही रही थी कि उसका फोन बीप हुआ। अकाउंट में तीस हज़ार रुपये ट्रांसफर हुए थे। मैसेज देखते ही रिमझिम ने गहरी साँस ली।

उसने पास रखा बैग उठाया और नीचे चली गई।

नीचे एक बुज़ुर्ग औरत बैठी थीं, जिनकी उम्र लगभग सत्तर वर्ष रही होगी। उन्होंने रिमझिम की ओर देखकर कहा—

“झुनु, नाश्ता कर लो, फिर कॉलेज जाना।”

रिमझिम मुस्कुराकर बोली—

“ठीक है, नानी माँ।”

रिमझिम की नानी मुंबई में अकेली रहती थीं। उनकी देखभाल के लिए घर में एक केयरटेकर थी। नानी का मानना था कि वह यह घर छोड़ नहीं सकतीं, क्योंकि यह उनके पति की आख़िरी निशानी था। इसी घर में उन्होंने उनके साथ ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत पल बिताए थे।

रचित जी ने कई बार उन्हें दिल्ली अपने साथ रहने को कहा था, लेकिन नानी हर बार मना कर देती थीं।

नाश्ता करते हुए रिमझिम बोली—

“पूजा, इधर आना!”

पूजा, जो घर और नानी की देखभाल करती थी, पास आई और बोली—

“क्या हुआ, झुनु?”

पूजा रिमझिम से चार साल बड़ी थी। रिमझिम ने कभी उसे नौकर जैसा महसूस नहीं होने दिया। वह पूजा को अपनी बड़ी बहन की तरह मानती थी, और यही बात पूजा को भी अच्छा लगता था।

रिमझिम बोली—

“मुझे एक स्कूटी चाहिए।”

नानी माँ और पूजा—दोनों उसे अजीब नज़रों से देखने लगीं, क्योंकि एक दिन पहले ही रिमझिम ने कहा था कि उसे स्कूटी बिल्कुल पसंद नहीं और स्कूटी से जाने से अच्छा वह पैदल चल ले।

पूजा हँसते हुए बोली—

“लेकिन तुमने तो कहा था कि स्कूटी से जाने से अच्छा तुम पैदल ही चली जाओगी!”

रिमझिम नकली मुस्कान के साथ बोली—

“क्या तुम पुरानी बातें लेकर बैठ गई हो? मुझे स्कूटी चाहिए। डैड ने साफ कहा है कि मैं उनका नाम, उनकी गाड़ियाँ वगैरह इस्तेमाल नहीं कर सकती। मुझे एक सिंपल लड़की की तरह अपना ग्रेजुएशन पूरा करना है। इसलिए स्कूटी चाहिए।”

नानी माँ और पूजा—दोनों हँस पड़ीं।

पूजा बोली—

“तुम दस मिनट रुको, स्कूटी आ जाएगी।”

रिमझिम मुस्कुराते हुए अपना नाश्ता करने लगी।

सिर्फ़ कुछ ही देर में रिमझिम बाहर आई।

उसके सामने एक व्हाइट कलर की स्कूटी खड़ी थी। उसे देखते ही रिमझिम ने हल्का-सा अजीब सा मुँह बनाया, फिर बिना कुछ कहे पूजा से स्कूटी की चाबी ली और स्कूटी स्टार्ट करके वहाँ से निकल गई।

उसे जाते देख पूजा हँस पड़ी और नानी माँ की तरफ़ देखते हुए बोली,

“नानी माँ, आपको क्या लगता है… रिमझिम कितने दिन तक अपना गुस्सा कंट्रोल कर पाएगी?”

नानी माँ हल्की-सी मुस्कान के साथ बोलीं,

“वो कर लेगी… क्योंकि वो अपने पापा से बहुत प्यार करती है।

उनके लिए वो सिर्फ़ ग्रेजुएट ही नहीं बनेगी, बल्कि अच्छे से टॉप भी करेगी।

मुझे रिमझिम पर पूरा भरोसा है… मैंने उसे बचपन से देखा है।

जितना प्यार वो अपने पापा से करती है, शायद ही झुनू ने कभी किसी से किया हो।

उसकी जान बसती है अपने पापा में।”

पूजा और नानी माँ मुस्कुराईं और घर के अंदर चली गईं।

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